नहाय-खाय
छठ पर्व की शुरुआत पवित्र स्नान और शुद्ध सात्विक भोजन से होती है। इस दिन व्रती नदी या जलाशय में स्नान कर अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू (लौकी) का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
॥ जय छठी मईया ॥
छठ पर्व की शुरुआत पवित्र स्नान और शुद्ध सात्विक भोजन से होती है। इस दिन व्रती नदी या जलाशय में स्नान कर अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू (लौकी) का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
इस दिन व्रती दिनभर निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को मिट्टी के चूल्हे पर गुड़, अरवा चावल और गाय के दूध से बनी खीर तथा रोटी का भोग छठी मईया को अर्पित कर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
कार्तिक शुक्ल षष्ठी की शाम को सूप, दउरा में ठेकुआ, मौसमी फल लेकर नदी/तालाब के घाट पर जाकर कमर तक जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी (डूबते हुए) भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
सप्तमी की भोर में उदीयमान (उगते हुए) सूर्य को अर्घ्य देकर 36 घंटे के कठिन निर्जला व्रत का समापन (पारन) होता है। छठी मईया से परिवार के सुख, स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है।
Om Adityaaya Vidmahe Divakaraya Dhimahi
Tannah Suryaah Prachodayat "Om, let me meditate on the Sun God, the maker of the day. Give me higher intellect, and let the Sun God illuminate my mind."
छठ घाट (Chhath Ghat) पर आपका स्वागत है। छठ महापर्व भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का सर्वाधिक पावन, शुद्ध और प्रकृति-समर्पित लोकपर्व है। यहाँ आप सुन और देख सकते हैं शारदा सिन्हा (Sharda Sinha), पवन सिंह (Pawan Singh), खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav), अनुराधा पौडवाल (Anuradha Paudwal), कल्पना पटवारी (Kalpana Patowary), प्रियंका सिंह, देवी और नीलकमल सिंह के 25 अमर पारंपरिक छठ गीत (Bhojpuri Chhath Songs), छठी मईया के भजन एवं सूर्य देव की आराधना।
छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला चार दिवसीय महाअनुष्ठान है। यह प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य (Lord Surya) और उनकी बहन षष्ठी देवी (छठी मईया) को समर्पित है। इस महापर्व में किसी पुरोहित या बिचौलिये की आवश्यकता नहीं होती; व्रती सीधे सूर्य देव और प्रकृति की पूजा करते हैं। छठ पूजा सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, नदियों की स्वच्छता, सात्विकता और परिवार के कल्याण का अद्वितीय संगम है।
इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पहले अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाता है और अगली सुबह उदीयमान (उगते हुए) सूर्य को उषा अर्घ्य देकर 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारन किया जाता है।
1. प्रथम दिवस (नहाय-खाय): पवित्र नदी/जलाशय में स्नान कर अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू (लौकी) का सात्विक प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
2. द्वितीय दिवस (खरना / लोहंडा): दिनभर निर्जला उपवास के बाद शाम को गुड़, चावल और गाय के दूध से बनी खीर तथा रोटी का भोग छठी मईया को अर्पित किया जाता है।
3. तृतीय दिवस (संध्या अर्घ्य): सूप और दउरा में ठेकुआ, मौसमी फल लेकर नदी घाट पर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
4. चतुर्थ दिवस (उषा अर्घ्य व पारन): सप्तमी की भोर में उगते सूर्य को अर्घ्य देकर 36 घंटे के कठिन व्रत का पारन संपन्न होता है।
उत्तर: शारदा सिन्हा का 'केलवा के पात पर', 'काँच ही बाँस के बहंगिया', 'उठउ सुरुज भइले बिहान', पवन सिंह का 'उगी सुरुज देव', 'ओरिए ओरिए मधु चुवे', अनुराधा पौडवाल का 'उगा हो सुरुजदेव' और खेसारी लाल यादव का 'छठी माई के करब बरतिया' सबसे लोकप्रिय पारंपरिक गीत हैं।
उत्तर: 'ॐ आदित्याय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्' - इस मंत्र का जाप छठ घाट पर सूर्य देव को अर्घ्य देते समय या प्रातःकाल करने से स्वास्थ्य, ओज, तेज और आत्मबल की वृद्धि होती है।
उत्तर: ठेकुआ गेहूं के शुद्ध आटे, शुद्ध देसी घी, गुड़ या चीनी और इलायची/सौंफ व सूखे मेवों को मिलाकर सांचे में ढालकर धीमी आंच पर तला जाता है। यह पूर्णतः शुद्ध और सात्विक महाप्रसाद है।